भारत सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। संतोष सारंगी, सचिव of नवनीत और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि सरकार जलाशयों पर फ्लोटिंग सौर पैनल लगाने के लिए विशेष प्रोत्साहन देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह घोषणा 11 मई को नई दिल्ली में आयोजित एक प्रमुख उद्योग सम्मेलन के दौरान की गई।
यह बात तो सभी को मालूम है कि भारत सौर ऊर्जा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन जमीन की कमी एक बड़ी चुनौती बन गई थी। यहीं पर 'फ्लोटिंग सोलर' का आईडिया महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि खाली पड़े जलस्रोतों का उपयोग करके बिजली उत्पादन बढ़ाना न केवल भूमि संरक्षण में मदद करेगा, बल्कि जल वाष्पीकरण को भी कम करेगा।
उद्योग जगत से सीधा संवाद
इस जानकारी का खुलासा CII (Confederation of Indian Industry) के वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन में हुआ। इस कार्यक्रम में देश के प्रमुख उद्योगपति, नीति निर्माता और तकनीकी विशेषज्ञ मौजूद थे। संतोष सारंगी ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार अब केवल नीति बनाए नहीं रखना चाहती, बल्कि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ठोस प्रोत्साहन पैकेज तैयार करना चाहती है।
वहां मौजूद उद्योग प्रतिनिधियों के लिए यह एक राहत की खबर थी। फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स की लागत अभी भी परंपरागत ग्राउंड माउंटेड सिस्टम से थोड़ी अधिक होती है। यदि सरकार सब्सिडी या कर छूट जैसे प्रोत्साहन देती है, तो निजी क्षेत्र निवेश में तेजी ला सकता है। हालांकि, सटीक वित्तीय आंकड़े या प्रोत्साहन का प्रतिशत अभी सामने नहीं आए हैं।
फ्लोटिंग सोलर क्यों जरूरी?
आइए समझते हैं कि इसका असली मतलब क्या है। जब सौर पैनल पानी की सतह पर तैरते हैं, तो पानी का तापमान पैनलों को ठंडा रखता है। इससे उनकी दक्षता (efficiency) बढ़ जाती है। साथ ही, यह पानी के बाष्पीभवन को रोकता है, जो गर्मियों में जल संकट से जूझ रहे राज्यों के लिए बहुत फायदेमंद है।
- भूमि बचत: कृषि या आवासीय इलाकों की जमीन का उपयोग नहीं होता।
- बेहतर दक्षता: पानी द्वारा प्राकृतिक शीतलण से ऊर्जा उत्पादन में सुधार।
- जल संरक्षण: जलवाष्पीकरण में कमी से जल स्रोत सुरक्षित रहते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास हजारों मेगावाट क्षमता के लिए उपयुक्त जलस्रोत हैं। यदि इनका सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह राष्ट्रीय ग्रिड को स्थिर करने में मदद कर सकता है।
अगले कदम और चुनौतियां
हालांकि, यह योजना अभी 'विचार-विमर्श' के चरण में है। सरकार को यह तय करना होगा कि किन जलस्रोतों को प्राथमिकता दी जाएगी—क्या ये सिंचाई के बांध होंगे, पेयजल के रिज़र्वॉयर, या औद्योगिक झीलें? इसके लिए जल संसाधन मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ समन्वय आवश्यक है।
इस सम्मेलन में अदानी ग्रुप के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया, जिनके पास भारत में बड़े पैमाने पर ऊर्जा परियोजनाएं हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्वदेशी क्षमताओं के विकास पर भी चर्चा की, जो दर्शाता है कि ऊर्जा क्षेत्र अब डिजिटल तकनीक के साथ जुड़ रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में सरकार एक विस्तृत नीति दस्तावेज जारी कर सकती है। इसमें प्रोत्साहन की शर्तें, परियोजना अनुमोदन की प्रक्रिया और पर्यावरणीय जांच के मानदंड शामिल होंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरकार फ्लोटिंग सौर पैनलों के लिए किस प्रकार का प्रोत्साहन दे सकती है?
हालांकि सटीक विवरण अभी जारी नहीं हुए हैं, लेकिन संभावित प्रोत्साहनों में कर छूट, वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF), या इंस्टॉलेशन लागत पर सब्सिडी शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य निवेशकों के लिए परियोजनाओं को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाना है।
क्या यह योजना सभी प्रकार के जलस्रोतों पर लागू होगी?
अभी यह तय नहीं हुआ है कि किन जलस्रोतों को प्राथमिकता मिलेगी। संभावना है कि सिंचाई के बांध और औद्योगिक झीलें पहले चरण में शामिल होंगी, जबकि पेयजल के रिज़र्वॉयर पर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण सावधानी बरती जा सकती है।
CII के इस शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
CII का वार्षिक शिखर सम्मेलन उद्योग और सरकार के बीच संवाद का माध्यम है। इस बार का फोकस नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने, निवेश के अवसरों और डिजिटल तकनीकों जैसे AI के एकीकरण पर था, ताकि भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत की जा सके।
फ्लोटिंग सौर पैनल लगाने से जल संसाधनों को कैसे लाभ होगा?
सौर पैनल पानी की सतह को ढक लेते हैं, जिससे धूप सीधे पानी पर नहीं पड़ती। इससे पानी के वाष्पीकरण (evaporation) की दर काफी कम हो जाती है, विशेष रूप से गर्म मौसम में। यह जल संरक्षण के लिए एक द्वि-उद्देश्यीय समाधान है।